कृत्रिम गर्भाधान क्या है इसका उद्देश्य, लाभ और महत्व लिखिए

कृत्रिम गर्भाधान क्या है इसका उद्देश्य, लाभ और महत्व लिखिए

कृत्रिम गर्भाधान क्या है अथवा कृत्रिम गर्भाधान की परिभाषा लिखिए

कृत्रिम रूप से उत्तम नस्ल के नर का वीर्य संचित करके, प्रयोग में लाने के समय तक उचित ढंग से सुरक्षित रखकर एवं उसकी गर्भ धारण करने की शक्ति की परीक्षा करके, वैसा ही या पतला करके, ऋतुमयी मादा की योनि में यंत्र द्वारा पहुंचाना ही कृत्रिम गर्भाधान या कदम वीर्य सेचन कहलाता है।

कृत्रिम गर्भाधान का उद्देश्य क्या है Object of A. I.

भारतवर्ष में कृत्रिम गर्भाधान प्रणाली अपनाने का मुख्य उद्देश्य शीघ्रता से पशु सुधार करना और सीमित संख्या में अच्छे साँण होते हुये, अपने पशुओं का दुग्धोत्पादन बढ़ाना तथा कृषि कार्य हेतु अच्छे बैल पैदा करना है।

कृत्रिम गर्भाधान के लाभ लिखिए Advantages of A. I.

कृत्रिम गर्भाधान की पद्धति, प्रजनन कार्य की एक ऐसी पद्धति है, जिसके द्वारा गो-पशुओं के सुधार की दिशा में अपेक्षाकृत शीघ्र परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। पशुपालन के क्षेत्र में कृत्रिम गर्भाधान एक बहुत बड़ा अनुसन्धान है, जिसके फलस्वरूप अच्छे सांडों के वीर्य से मादाओं से बच्चे लेकर बहुत ही शीघ्र पशुओं का विकास संभव है। 
कृत्रिम गर्भाधान क्या है इसका उद्देश्य, लाभ और महत्व लिखिए
कृत्रिम गर्भाधान क्या है इसका उद्देश्य, लाभ और महत्व लिखिए


कृत्रिम गर्भाधान से निम्नलिखित लाभ हैं - 


  • कृत्रिम गर्भाधान द्वारा अच्छी नस्ल के सांड जो सीमित मात्रा में हैं, उनसे इस विधि द्वारा अधिक संख्या में उत्तम संन्तति प्राप्त की जा सकती है। प्राकृतिक रूप से सम्भोग कराने पर एक सांड से एक वर्ष में अधिक से अधिक 70 से 100 बच्चे मिल सकते हैं,
  • जबकि कृत्रिम गर्भाधान द्वारा वही सांड उतने ही समय में 2000 तक बच्चे पैदा कर सकता है। इस प्रकार इस विधि से अधिक लाभ है और साथ ही सांडों की कमी की समस्या का समाधान भी है।
  • इस विधि द्वारा बड़े से बड़े सांड को छोटी से छोटी मादा से मिलाया जा सकता है।
  • अच्छे सांड जो कभी पैरों में चोट लग जाने, लकवा मार जाने अथवा किसी अन्य कारण से गाय पर नहीं चढ़ सकते, इस विधि द्वारा प्रजनन हेतु प्रयुक्त किए जा सकते हैं।
  • सांडों से एकत्रित किया हुआ वीर्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजकर, प्रजनन के कार्य में लाया जा सकता है। अतः यह ढंग काफी सस्ता पड़ता है और विदेशों से भी अच्छी नस्ल के सांडों का वीर्य मंगाकर शीघ्र ही पशुधन का उत्थान किया जा सकता है।
  • कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा एक जाति के सांड का अन्य जाति की मादा से सम्भोग कराया जा सकता है। इस प्रकार नई-नई जातियां उत्पन्न की जा सकती हैं, जोकि प्राकृतिक प्रजनन से नितान्त असंभव है।
  • हमें थोड़ी ही संख्या में अच्छे सांड रखने की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए खर्च कम और लाभ अधिक होता है।
  • एक गरीब किसान जो अच्छा सांड खरीद नहीं सकता है, इस विधि द्वारा मनवांछित फल पा सकता है।
  • परीक्षित सांडों का प्रयोग होने के कारण मादाओं में जननेन्द्रिय रोगों के फैलने से रोकथाम होती है।
  • चूंकि सहवास ( Mating ) प्राकृतिक रूप से नहीं होता, अतः मादा से नर को भी जननेन्द्रिय रोग नहीं लग पाते।
  • नर या मादा में बाँझपन अथवा उनके वीर्य या रज में यदि कोई खराबी है, तो परीक्षानुसार पता लग जाता है कि इस दोष के लिए कौन उत्तरदाई है।
  • कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा मादाओं में गर्भधारण कराने से मादाओं की गर्भधारण करने की क्षमता बढ़ती है।
  • इस विधि में अच्छा अभिलेख रखा जाता है, जिससे चुनाव तथा प्रजनन-संबंधी ज्ञान की बुद्धि होती है।
  • सांडों की प्रजनन शक्ति की परीक्षा हो जाती है कि सन्तति में कितने प्रतिशत सांड के गुण आये हैं।
  • वे मादाएं जो लूली, लंगड़ी होने के कारण प्राकृतिक मैथुन से गर्भधारण नहीं कर सकती, वे इस विधि द्वारा गर्भित की जा सकती हैं।
  • मादा के ऋतुमयी होने पर पशुपालक को सांड की तलाश में गांव-गांव नहीं घूमना पड़ता है।
  • इस विधि द्वारा इच्छित गुणों के सांड से मादा को गर्भित कराके मनवांछित सन्तति प्राप्त की जा सकती है।
  • कृत्रिम प्रजनन से उत्पाद बढ़ता है, लागत कम पड़ती है और कृषक को इससे काफी लाभ होता है।
  • यह सब प्रकार के किसानों, शुद्ध वंशीय पशुपालकों, बड़े पैमाने पर पशु पालने वाले प्रजनकों एवं ऐसे कृषकों को भी लाभदायक तथा व्यवहारिक सिद्ध होता है, जिसके पास केवल एक या दो गाय अथवा भैंस हों।


कृत्रिम गर्भाधान के अवगुण अथवा हानियां demerits of A. I.


कृत्रिम गर्भाधान के निम्नलिखित अवगुण अथवा हानियां है -

  • इससे हमें प्रशिक्षित व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है, जो समुचित मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाते और साथ ही उन्हें ट्रेनिंग देने में धन भी खर्च होता है।
  • इस विधि में प्रयुक्त होने वाला सामान काफी मूल्यवान होता है।
  • यदि यंत्रों को साफ करने की व्यवस्था भली प्रकार न रखी गई, तो नर तथा मादा दोनों को ही जननेन्द्रिय रोग लगने का भय रहता है। अतः थोड़ी सी लापरवाही करने पर भी बहुत हानि हो सकती है और इस प्रकार अच्छे प्रजनन के स्थान पर दूषित प्रजनन हो जाता है।
  • कृत्रिम गर्भाधान की सेवाओं का भली-भांति उपयोग वहीं हो सकता है, जहां अच्छी सड़कें उपलब्ध हो, जिनसे वीर्य के यातायात में काफी सुविधा हो।
  • कृत्रिम गर्भाधान वहीं सफल हो सकता है, जहां पर मादा पशु अधिक संख्या में हों।
  • मादा को ऋतुमयी जानने के लिए काफी ज्ञान, परिश्रम एवं समय की आवश्यकता होती है और यदि भली-भांति इसकी परीक्षा न हो पाई, तो इस विधि से आशातीत परिणाम भी नहीं निकलते।
  • कठिनता से वश में आने वाले पशुओं में यह कार्य कभी-कभी बिल्कुल असम्भव सा हो जाता है।


कृत्रिम गर्भाधान का विषय क्षेत्र अथवा कृत्रिम गर्भाधान का महत्व scope of A. I. 

मनुष्य के जीवन में आदि काल से ही पशुओं का बहुत बड़ा महत्व रहा है। पशु भूसा, घास इत्यादि मोटे चारे खाकर, मानव जाति के लिए दूध, अण्डा, ऊन तथा मांस जैसे बहुमूल्य पदार्थ प्रदान करते हैं। अतः पशुधन की उन्नति ही हमारी वास्तविक उन्नति है। इस बात को ध्यान में रखकर प्रत्येक उन्नतशील देश में बहुत पहले से ही पशुधन विकास की ओर समुचित प्रयास किया गया है।

भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में जहां की लगभग 80 प्रतिशत जनता का जीवन कृषि के ऊपर ही निर्भर है, पशु रीढ़ की हड्डी के सदृश रहा है और भविष्य में रहेगा भी। वैज्ञानिक दृष्टि से हम चाहे कितना ही विकास क्यों न कर लें, लेकिन हमारे कृषि क्षेत्र की सर्वांगीण उन्नति तथा प्रगति आखिरकार पशुधन पर ही निर्भर है।

दूध के अधिकतम उत्पादन एवं कृषि की सफलता के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि पशुधन के उत्थान के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। उनकी बहुमुखी उन्नति ही हमारी संपूर्ण विकास योजनाओं की सफल सिद्धि है। अतः भारत जैसे विकासशील देश का वास्तविक उत्थान पशुधन के समुचित विकास पर ही निर्भर है।

देश को एक कल्याणकारी मंगलमय राज्य बनाने के लिए हमें पशुधन का सर्वांगीण विकास करना होगा और इस उत्कर्ष पर हमें कौन पहुंचाएगा ? केवल एक उत्तर - कृत्रिम गर्भाधान 

भारत की कुल पशु संख्या विश्व की पशु संख्या का लगभग एक-चौथाई है। वैसे तो किसी देश में अधिक संख्या में पशु होना, उनके लिए गर्व की बात है, परंतु यह गर्व तभी सच्चा है, जब वहां के पशु अच्छे उत्पादक एवं अधिक उपयोगी हों। परंतु इस विषय पर हमको अन्य देशों के सामने नतमस्तक होना पड़ता है क्योंकि हमारी इतनी बड़ी पशु संख्या से उत्पादन सबसे कम है।

एक भारतीय गाय का औसत उत्पादन लगभग 200 लीटर प्रति ब्यांत है, जबकि विदेशों में यह 2500 से 4000 लीटर तक है। लगभग ऐसी ही दशा हमारे भारवाही पशुओं की है। हमारे देश में दूध की खपत 170 मिली लीटर प्रति मनुष्य प्रतिदिन है, जबकि सामान्य स्वास्थ्य रखने के लिए पोषण-विशेषज्ञों ने 300 मिली लीटर नित्य निर्धारित की है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में संसार के सभी देशों से अधिक पशु होते हुए भी हमारी दूध की न्यूनतम निर्धारित दैनिक आवश्यकता की भी पूर्ति नहीं होती है। अतः यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वर्तमान समस्या के समाधान के लिए हमारे पशु जैनेटिकली सुविकसित नहीं है। अतः दूध तथा भारवाही गुणों के लिए हमें अपने पशुओं का जैनेटिक विकास करना होगा और यह तभी सम्भव है जब हम अच्छे प्रजनन ढंगों को अपनाएंगे।

चूंकि शुद्ध नस्ल के अच्छे सांडों की कमी होने के कारण उत्तम प्रजजन ने ढंगों से पशुधन का विकास बहुत धीरे-धीरे सम्भव है। अतः कृत्रिम गर्भाधान द्वारा उचित नरों का प्रजनन के लिए चुनाव होकर, सर्वोत्तम नर का उत्तम एवं निम्न कोटि की मादाओं से समागम ( mating ) होकर, एक ही समय में चुनींदा उत्तम नर का अनेक मादाओं में प्रयुक्त होकर तथा वीर्य के परिवहन द्वारा प्रजनन का चुने हुए रूप में प्रयोग होकर इस विकट समस्या का पूर्ण रूप से निदान होकर देश शीघ्र ही धन-धान्य से संपन्न होकर उन्नति के शिखर पर पहुंच जाएगा।

हमें देश में कृत्रिम गर्भाधान का भविष्य उज्जवल करने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना अति आवश्यक है -

1. यदि कोई मादा पशु ऋतुमयी हो तो उसे निश्चित समय पर कृत्रिम गर्भाधान केंद्र पर ले जाना चाहिए।

2. वीर्य की दशा, शुक्राणु, नस्ल, तिथि, समय आदि का पूर्ण अभिलेख रखा जाना चाहिए।

3. ऋतुमयी होने में संदेह होने पर मादा की योनि-वीक्षण ( Vaginal speculum ) द्वारा परीक्षा की जाये।

4. इस प्रकार पैदा हुई उन्नतिशील बछियों को, बड़े होने पर पुनः उन्नत एवं सिद्ध सांडों के वीर्य से गर्भित कराया जाना चाहिए।

5. देशी सांडों को बधिया किया जाए, ताकि वे प्राकृतिक प्रजनन करके गांव की नस्ल को खराब न कर सके।

6. जो पशु अनुपयोगी हैं उन्हें गौ-सदन भेज देना चाहिए।

7. लोकप्रियता के लिए इस विधि का समुचित प्रचार किया जाना चाहिए।

भारत में कृत्रिम गर्भाधान के परिसीमन Limitations of A. I. In india


भारत में कृत्रिम गर्भाधान के परिसीमन निम्नलिखित हैं -

  • कृत्रिम गर्भाधान के प्रति जनता में अश्रद्धा एवं अविश्वास बहुत है।
  • जनता में झूठी धारणा: जैसे कि कुछ लोगों का यह कहना है कि इस विधि द्वारा बच्चे तथा पशुओं में जननेन्द्रिय रोग पैदा होते हैं।
  • धार्मिक विचारों के कारण अनुपयोगी पशुओं का वध तथा देशी सांडों को बधिया करने में कठिनाई।
  • इस विधि द्वारा जन्मित नर बच्चों के वितरण में कठिनाई।
  • वीर्य परिवहन के लिए प्रतिकूल वातावरण।
  • अच्छे प्रशिक्षित तथा ज्ञानी मनुष्यों की कमी।
  • रिकार्ड ( अभिलेख ) का भली-भांति न रखा जाना।
  • पशुओं की अच्छी देख-भाल की कमी।
  • लोकमत द्वारा कृत्रिम गर्भाधान को उत्तम प्रजनन विधि के रूप में न स्वीकार किया जाना। 


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