फल परिरक्षण क्या हैं इसके लाभ, महत्व एवं उपयोगिता लिखिए

फल परिरक्षण क्या हैं इसका महत्व एवं उपयोगिता लिखिए 

सब्जी या फलों को भौतिक अथवा रासायनिक विधियों द्वारा अपेक्षाकृत अधिक समय तक इस प्रकार सुरक्षित रखना ताकि उसके गुणों में कोई कमी ना आये, फल परिरक्षण कहलाता है।
फल परिरक्षण क्या हैं इसके लाभ, महत्व एवं उपयोगिता लिखिए
फल परिरक्षण क्या हैं इसके लाभ, महत्व एवं उपयोगिता लिखिए 


फल परिरक्षण की उपयोगिता एवं महत्व

भारत में फल परिरक्षण शताब्दियों पूर्व से ही आचार, मुरब्बा आदि के रूप में होता चला आ रहा है,लेकिन इसका वैज्ञानिक विकास फल पदार्थ अनुसंधान, प्रयोगशाला की स्थापना 1942 से प्रारंभ हुआ।

आज के समय में अनेक बड़े शहरों कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, नागपुर, श्रीनगर आदि में अनेक फल संरक्षण फैक्ट्रियां हैं,जिनमें आवश्यकता से अधिक उपलब्ध फलों को पैकिंग करके विभिन्न क्षेत्रों में भेजा जाता है, जहां ये पैदा नहीं होते हैं।

फलों से बने हुए पदार्थों को ऐसे मौसम में प्रयोग कर सकते हैं जब इन फलों का मौसम नहीं होता है। फलों से बने हुए अचार, मुरब्बे को वर्ष भर प्रयोग किया जा सकता है।

फल परिरक्षण से होने वाले लाभ ( Advantage of fruit preservation )


(1) जिन स्थानों पर फल पैदा नहीं होते हैं, वहां फलों को विभिन्न रूपों में संरक्षित करके भेज सकते हैं।

(2) संरक्षित फल पदार्थ कम स्थान घेरते हैं, अतः आसानी से कम खर्च में इनको विभिन्न क्षेत्रों में भेजा जा सकता है।

(3) संरक्षित फल पदार्थों को उस समय भी प्रयोग कर सकते हैं, जब उनके फल मौसम न रहने के कारण बाजार में नहीं मिलते हैं।

(4) बाजार में जब फलों की अधिकता होती है उस समय कम दामों में खरीदकर एवं संरक्षित कर बेमौसम में अधिक लाभ कमाया जा सकता है।

(5) फल संरक्षण उद्योग से अनेक लोगों को रोजगार मिलता है।

(6) फल संरक्षण उद्योग से संबंधित अन्य उद्योगों को बढ़ावा मिलता है। जैसे - टिन डिब्बा उद्योग, कांच की बोतल उद्योग, प्लास्टिक उद्योग आदि।

(7) प्राकृतिक विपदा सूखा, बाढ़, भूकंप एवं युद्ध के समय फल संरक्षित पदार्थों को हेलीकॉप्टर के द्वारा सुगमता से दुर्लभ स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है।

(8) फल एवं सब्जियों का संरक्षण करके उनके भाव स्थर किए जा सकते हैं।

(9) जो फल खाने योग्य नहीं होते हैं, उनका प्रयोग चटनी, जैम, जेली आदि बनाने मैं किया जा सकता है।

(10) स्वादिष्ट व पौष्टिक फल वर्ष भर मिलते रहते हैं।

(11) फल संरक्षण से किसानों की आय में वृद्धि होती है।

(12) फल संरक्षण से फलों को खराब होने से बचाया जा सकता है।

(13) संरक्षित पदार्थों का विदेशों में निर्यात करके विदेशी मुद्रा प्राप्त की जा सकती है

(14) संरक्षित फल पदार्थों को भोजन में शामिल कर संतुलित आहार लिया जा सकता है।

(15) फल संरक्षण से किसानों की आय में वृद्धि होती है, जिससे फल उत्पादन में किसानों की रुचि बनी रहती है।

फल तथा सब्जी परिरक्षण की विधियां ( methods of fruit and vegetable preservation )


परिरक्षण के विभिन्न सिद्धांतों के अनुसार फल एवं सब्जी के परिरक्षण की प्रमुख विधियां निम्नलिखित हैं -

(1) चीनी द्वारा परिरक्षण

(2) नमक द्वारा परिरक्षण

(3) तेल एवं मसालों द्वारा परिरक्षण

(4) अम्ल द्वारा परिरक्षण

(5) किरणन

(6) किण्वन

(7) कार्बोनेशन

(8) पूर्तिरोधन

(9) सान्द्रीकरण

(10) निर्जीवीकरण एवं पाश्चुरीकरण

(11) हिमीकरण एवं शीत संग्रहण

(12) निर्जलीकरण एवं सुखाना

(13) डिब्बा बंदी एवं बोतलों में भरना

फल तथा सब्जियों का सुखाकर परिरक्षण करना

फल तथा सब्जीयों को सुखाकर हम काफी लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं। फल तथा सब्जियों को सुखाने के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार की विधियां उपयोग में लाई जाती है -

1. प्राकृतिक रूप से सुखाना ( Natural drying )

2. कृत्रिम रूप से सुखाना ( Artificial drying )


1. प्राकृतिक रूप से सुखाना ( Natural drying )

प्राकृतिक रूप से सुखाना ( Natural drying ) विधि में भी दो प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है -

अ. धूप में सुखाना - इस विधि में विभिन्न आकार की लकड़ीयों की ट्रे होती है, जिसमें सब्जियों को रखकर धूप में सुखाया जाता है। यह विधि सब्जियों तथा फलों को सुखाने की एक अच्छी विधि है। क्योंकि इस विधि में मेहनत की जरूरत नहीं होती है।

ब. गन्धक का धुआं देना - इस विधि में सब्जियों तथा फलों में गन्धक का धुआं दिया जाता है। गन्धक का धुआं देने से फल तथा सब्जियों में उपस्थित कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे अपेक्षाकृत फल तथा सब्जियों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

2. कृत्रिम रूप से सुखाना या निर्जलीकरण  ( Artificial drying or Dehydration )

इस विधि में ड्रायर अथवा डीहाइड्रेशन के द्वारा सब्जियों को जल्दी सुखाया जा सकता है। फलों को हाइड्रोजन की सहायता से जल्दी सुखाया जाता है। इस विधि में सब्जियों को 50° - 60° ताप पर ड्रायर में सुखाया जाता है। फल तथा सब्जियों को अच्छे से सुखाने के बाद इन्हें काफी लंबे समय तक आसानी से सुरक्षित रखा जाता है।

फलों को धूप में सुखाने एवं मशीन द्वारा सुखाने ( निर्जलीकरण ) में क्या अंतर है 

फलों को धूप में सुखाने एवं मशीन द्वारा सुखाने ( निर्जलीकरण ) में अन्तर निम्नलिखित है - 


धूप में सुखाना sun drying

1. धूप में सुखाने से फलों के रंग तथा गन्ध में थोड़ा सा अंतर आ जाता है।

2. फलो को धूप में सुखाने से इसमें स्वच्छता नहीं रहती है। कुछ गन्दगी तथा धूल फलों आदि में चिपक जाते हैं।

3. फलों को धूप में सुखाने के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता होती है।

4. वर्षा ऋतु में धूप कम निकलती है। जिससे वर्षा ऋतु में धूप न मिलने के कारण फलों को सुखाना असंभव हो जाता है।

5. इस विधि द्वारा सुखाने में अधिक समय लगता है।

6. इस विधि द्वारा फलों को सुखाने में किसी भी प्रकार की मशीन की आवश्यकता नहीं होती है।

7. घरों में फलों को सुखाने के लिए यह विधि आसानी से अपनाई जा सकती है।

8. यदि फलों को हम अधिक मात्रा में सुखायें तो यह विधि काफी कीमती पड़ती है।

मशीन द्वारा सुखाना dehydration

1. इस विधि द्वारा फलों को सुखाने पर सूखे फलों का रंग एवं स्वाद ताजे फलों की भांति ज्यों का त्यों रहता है।

2. इस विधि द्वारा फलों को सुखाने पर गन्दगी नहीं होती है। अतः फल स्वच्छ एवं स्वादिष्ट होते हैं।

3. इस विधि में फलों को सुखाने के लिए कम स्थान की आवश्यकता होती है।

4. इस विधि में वर्षा ऋतु में भी फलों को आसानी से सुखाया जा सकता है।

5. इस विधि द्वारा फलों को सुखाने में बहुत कम समय लगता है।

6. इस विधि में फलों को सुखाने के लिए मशीन ( dehydrator ) की आवश्यकता पड़ती है।

7. इस विधि में फलों को घरों आदि में आसानी से नहीं छुखाया जा सकता है।

8. इस विधि में फलों को यदि अधिक मात्रा में सुखायें तो यह विधि काफी सस्ती पड़ जाती है।

फलों और सब्जियों को सुखाने की विधियां

फलों तथा सब्जियों की तुड़ाई के तुरन्त बाद ही वह खराब होना शुरू हो जाती हैं। अतः इन्हें लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्राकृतिक एवं कृत्रिम विधियों द्वारा सुखाया जाता है। फलों तथा सब्जियों को सुखाने के बाद उन्हें हम काफी लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं अथवा भंडारित कर सकते हैं। इन्हें हम वर्ष में कभी भी उपयोग में ला सकते हैं।

फलों को सुखाने की विधियां Dehydration of fruits


(1) फलों को चुनना ( selection of fruits )

इसके लिए अच्छे फल चुन लिए जाते हैं। फल ताजे होने चाहिए। फाइल ज्यादा दिन पुराने एवं सड़े नहीं होने चाहिए। इसके लिए ताजे फल उत्तम माने जाते हैं।


(2) साफ एवं तैयार करना ( washing and prepration )

फलों को चलते हुए पानी से साफ कर लेते हैं। उसके बाद फलों के छिलके उतारकर एवं काटकर सुखाने के लिए तैयार कर लिए जाते हैं।

(3) ब्लान्च करना एवं गंधक का धुंआ देना ( blanching and sulphuring )

सब्जियों को ब्लान्च किया जाता है, लेकिन फलों को सुखाने के पहले गंधक का धुंआ दिया जाता है। फलों को गंधक का धुंआ खास प्रकाश के बक्सों में बंद करके दिया जाता है।

धुंआ देने के लिए उनको चारपाई पर फैलाकर ऊपर से चादर से ढक देते हैं तथा चारपाई के नीचे धुंआ करते हैं।
2.5 से 3 ग्राम गंधक प्रति किलो फल प्रयोग की जाती है तथा धुऐं को 30 से 60 मिनट तक देते हैं।

(4) सुखाना ( drying )

कटे व सल्फर का धुंआ दिए गए फलों को सुखाने के उद्देश्य से जालियों पर फैला देते हैं तथा जालियां डिहाइड्रेटर में एक के ऊपर एक लगा दी जाती हैं और डिहाइड्रेटर के ढक्कन को बंद कर दिया जाता है।

उसके पश्चात इनको बिजली तथा भट्टी या स्टोव से गर्म करते हैं। अधिकतर फलों को 140 फै. तापक्रम पर सुखाया जाता है‌।

(5) फलों को इकट्ठा करना एवं संग्रह करना ( collection and storage )

सूखे हुए फलों को डिहाइड्रेटर से बाहर निकाल कर इकट्ठा कर लेते हैं। उसके बाद सूखे हुए फलों को सूखे स्थान पर व सूखे बर्तन में बंद करके एक जगह रख देते हैं।


सब्जियों को सुखाने की विधियां Dehydration of vegetables


सब्जियों को निम्न तरीकों द्वारा सुखाया जाता है -

1. गाँठ गोभी 

सबसे पहले गाँठ गोभी के डण्ठल को निकालकर छील लीजिए। फिर छोटे-छोटे टुकड़े काट लीजिए, इसके बाद 5 ग्राम पोटैशियम मेटा-बाइ-सल्फाइड को 1 लीटर पानी में घोलिए। इस घोल में टुकड़ों को आधा घंटे के लिए रख दीजिए। इसके बाद टुकड़ों को पानी से धोकर धूप में सुखा लीजिए।

2. चने की भाजी

भाजी में से मोटे डण्डलों को अलग कर लीजिए। फिर भाजी को धूप में सुखा लीजिए। इस भाजी को किसी भी प्रकार के घोल में भिगोने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भाजी को किसी भी घोल में भिगोने से अथवा पानी में धोने से आवश्यक लवण निकल जाते हैं, जो गुणकारी होते हैं।

3. पत्ता गोभी

पत्ता गोभी में बाहरी पत्तों को बीच के डण्ठल वाले भाग से अलग कर लीजिए। पत्तों के लंबे-लंबे टुकड़े काट लीजिए। इसके बाद 10 ग्राम सोडियम बाइकार्बोनेट या खाने का सोडा 1 लीटर पानी में घोल लीजिए। इस घोल में पत्तों को 2 मिनट तक उबालिए। उबालने के तुरंत बाद ही पत्तों को ठंडे पानी से धो लीजिए, इसके बाद धूप में सुखा लीजिए।

4. पुदीना

पुदीने को किसी भी प्रकार के घोल में डालने की आवश्यकता नहीं है। इसको अच्छी तरह से पानी में धोकर धूप में सुखा लीजिए।

5. पालक

पालक को पहले साफ पानी से धो लीजिए, फिर 5 मिनट तक खौलते हुए पानी में रखिए। इसके तुरंत बाद ही ठंडे पानी से धोकर धूप में सुखा लीजिए।

6. मेथी की भाजी

भाजी को पानी से अच्छी तरह धो लीजिए। फिर 20 ग्राम नमक को 1 लीटर पानी में घोलिए। इस बनाए हुए घोल में 1 मिनट तक उबालिए। इसके तुरन्त बाद ही ठंडे पानी से धोकर सुखा लीजिए।

7. आलू

अच्छी किस्म के बड़े-बड़े आलू लीजिए। आलू को छीलकर छोटे-छोटे तथा पतले टुकड़े ( चिप्स ) बनाइए। आलू को काटते समय टुकड़ों को 0.05% पोटैशियम मेटा-बाइसल्फाइट के घोल में रखते जाइए। इस घोल में टुकड़ों को 15 मिनट तक रहने दे। इसके बाद टुकड़ों को 5 मिनट तक उबालिए और फिर सुखा लीजिए।


8. गाजर

गाजर के छोटे-छोटे लम्बवत् टुकड़े काटिए। इसके पश्चात 26 ग्राम नमक को 1 लीटर पानी में लेकर घोल बनाइए। टुकड़ों को इस घोल में 3 मिनट तक उबालिए। इसके बाद टुकड़ों को तुरंत ही ठंडे पानी से धोकर सुखा लीजिए।

9. करेला 

यदि आप चाहें तो छील लीजिए नहीं तो बिना छिले भी सुखा सकते हैं। फिर टुकड़े काटिए। इसके बाद पानी में 8 मिनट तक उबालकर तुरंत बाद ही ठंडे पानी से धोकर सुखा लीजिए।

10. टमाटर

अच्छी किस्म के मोटे गूदे वाले टमाटर लीजिए। खौलते पानी में टमाटरों को 1 मिनट रखकर ठंडे पानी में रख दीजिए। इसके बाद टमाटर के ऊपर का छिलका निकाल दीजिए। फिर टमाटर को चार भागों में काटकर सुखा दीजिए।

11. प्याज

प्याज के बाहर का छिलका निकाल लीजिए। जड़ की तरफ का हिस्सा काटकर लंबे-लंबे आकार के टुकड़े काट लीजिए। 50 ग्राम नमक का 1 लीटर पानी में घोल बनाकर इस घोल में टुकड़ों को 10 मिनट तक रखिए। इसके तुरंत बाद ही टुकड़ों को पानी से धोकर सुखा लीजिए।


12. फूल गोभी

डण्ठल और पत्तियों को अलग-अलग करके छोटे-छोटे टुकड़े बना लीजिए। फिर 5 मिनट खौलते पानी में टुकड़ों को रखकर तुरंत ही ठंडे पानी से धो लीजिए। इसके बाद 5 ग्राम पोटैशियम मेटा-बाइसल्फाइट 1 लीटर पानी में घोलकर घोल बनाइए। इस घोल में टुकड़ों को 1 घंटे तक रखिए। फिर टुकड़ों को पानी से धोकर सुखा लीजिए।

13. बैंगन

बैंगन के लम्बे आकार के मोटे टुकड़े काट लें। फिर टुकड़ों को 5 मिनट खौलते पानी में रखकर, ठण्डे पानी से धो लीजिए। 10 ग्राम पोटैशियम मेटा-बाइसल्फाइट का 1 लीटर पानी में घोल बनाइए। फिर इन टुकड़ों को इस घोल में धोकर सुखा लीजिए।

14. भिण्डी

भिण्डी का डंठल और ऊपर की नोक काट लीजिए। फिर भिण्डी को चार भागों में काट लीजिए। इन टुकड़ों को 5 मिनट खौलते हुए पानी में रखकर तुरंत ही ठंडे पानी से धो लीजिए। फिर सुखा लीजिए।

15. मटर

मटर को छीलकर 2 मिनट तक उबलते हुए पानी में रखिए। तुरंत ही ठंडे पानी में रखकर निकाल लीजिए। फिर धूप में सुखा लीजिए।

16. शलजम

सबसे पहले शलजम का डण्ठल निकाल लीजिए। फिर छीलकर टुकड़े काट लीजिए। फिर टुकड़ों को 3 मिनट तक उबालकर तुरंत ही ठंडे पानी में रख दीजिए। 5 ग्राम पोटैशियम मेटा-बाइसल्फाइट का 1 लीटर पानी में घोल बनाइए। फिर इस घोल में टुकड़ों को 1 घंटे तक पड़ा रहने दे। इसके बाद टुकड़ों को सुखा लीजिए।

फल तथा सब्जीयों के परिरक्षण की सीमाएँ

फल तथा सब्जी परिरक्षण प्रौद्योगिकी के सामने सबसे बड़ी समस्या फलों तथा सब्जियों की तुड़ाई के बाद उचित ज्ञान के अभाव के कारण आती है।

फल तथा सब्जी परिरक्षण उद्योगों को निम्नलिखित समस्याओं से संघर्ष करना पड़ता है - 


(1) तुड़ाई व परिपक्व से संबंधित समस्याएँ

1. अधपके फलों को तोड़ना।

2. फलों में उपयुक्त परिपक्वन में कमी।

3. फलों के विकास एवं परिपक्वन में भिन्नता।

4. उपयुक्त वातावरण न होने के कारण फल व टमाटर के पकने में कठिनाइयां।

5. टमाटर में एक समान रंग का विकास ना होना।

6. फलों की विभिन्न किस्मों की तुड़ाई हेतु परिपक्वन संबंधी उचित मानक का अभाव।

7. विपणन संबंधी ( क्रय और विक्रय अनुरोध ) प्रभाव, जिससे उत्पादक फल की परिपक्वता की परवाह किए बिना ही उन्हें भी तोड़कर बाजार में बेच देता है।

(2) कच्चे माल से संबंधित समस्याएं 

1. वांछित गुणवत्ता वाले फलों की कमी।

2. डिब्बा बंद करने हेतु उचित किस्म के फलों की कमी।

3. फलों के आकार एक समान ना होना।

4. कच्चे फल।

5. स्थानीय मंडी में उपलब्ध टमाटरों में उचित रंग का न होना और घुलनशील ठोस पदार्थ की मात्रा का कम होना।

6. अनानास में अनुकूल आमाप का न होना, जिससे व्यर्थ पदार्थ का अधिक निकलना और अधिक अम्लता ( 2% ) होना।

7. अनानास का कम या अधिक पका हुआ होना।

8. आम में स्पंज के समान ऊतकों का होना।

9. आम का स्टोन वीविल ( गुठली में घुन ) द्वारा ग्रस्त होना।


(3) परिवहन और भंडारण से संबंधित समस्याएं

1. लंबी दूरी के गमन के दौरान क्षति।

2. उपयुक्त परिवहन का अभाव ( परिवहन का अन्दर से न तो उपयुक्त हवादार होना और न ही तापमान व अपेक्षिक आर्द्रता पर नियंत्रण होना )

3. परिवहन सुविधा में कमी, विशेषकर फलों के मौसम में।

4. कच्चे माल की मौसमी प्रकृति के कारण भंडारण में कठिनाइयां ( शीत भंडार ग्रह की कमी, यदि उपलब्ध है तो बहुत ऊंची कीमत पर )

(4) विपणन और आर्थिकी से संबंधित समस्याएं

1. एक बहुत बड़ी संख्या में मध्यस्थ लोग विपणन सेवा में संलग्न रहते हैं, परंतु ये कच्चे माल की कीमत को अधिक बढ़ा देते हैं।

2. कच्चे माल की परिपक्वता और कीमत पर उचित नियंत्रण का न होना।

3. उत्पादक और संसाधनों को उचित आर्थिक सहायता का अभाव।

(5) तकनीकी से संबंधित समस्याएं

1. जैम की बोतलों को सील बंद करने के बाद हवा के बुलबुले।

2. कृत्रिम रंग व सुवास की एक समानता में कमी।

3. नारंगी स्क्वाश में भंडारण के दौरान अपवर्णता।

4. नारंगी स्क्वाश में गूदा का अलग हो जाना।

5. टमाटर कैचप में " ब्लैक नेक "

6. डिब्बाबंद पपीता में संक्षारण।

7. डिब्बाबंद आम ( तोतापरी ) के गूदे का काला होना।

8. टोमेटो प्युरी की शीघ्र खराब होना।

(6) नीति से संबंधित समस्याएं

कभी-कभी सरकारी नीतियां कृषकों तथा संसाधकों को प्रभावित करती हैं।

फल तथा फल पदार्थों के खराब होने के कारण ( Causes of decay of fruits and fruits products )

प्रायः देखा जाता है कि सब्जियां, फल तथा उनसे बनाये गए खाद्य पदार्थ अधिक लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह पाते हैं। उनके रंग, सुगंध, स्वाद एवं विटामिन सहित सभी पोषक तत्वों में कमी आने लगती है। उनमें फफूंदी लगने लगती है और धीरे-धीरे वे सड़ने-गलने लगते हैं।

सब्जियां, फल एवं उनसे बनाए गए खाद्य पदार्थ निम्नलिखित कारकों के कारण सड़-गल कर खराब हो जाते हैं - 


1. फफूंदी अथवा कारक ( Fungi )

फफूंदी खाद्य पदार्थों पर नमी एवं गर्मी पाकर लग जाती है। प्रायः वर्षा ऋतु में खाद्य पदार्थों पर सफेद, काले, नीले एवं हरे रंग का रुई जैसा पदार्थ उगता दिखाई देता है, यह फफूंदी ही है, जो इन खाद्य पदार्थों को नष्ट करती है।

फफूंदी साधारण अम्लीय माध्यम में पनपती है। फफूंदी लगे हुए भाग को काटकर अलग कर देना चाहिए तथा पदार्थों को 20-25 मिनट तक 160°-165° फा. तापक्रम पर गर्म करने से खमीर को नष्ट किया जा सकता है। खमीर के द्वारा खाद्य पदार्थों का रंग व स्वाद खराब हो जाता है।


परिरक्षित फलों तथा सब्जियों के व्यापार का भविष्य ( Future scope of preserved fruits and vegetables business )


भारत में फल परिरक्षण का कार्य ज्यादा पहले से नहीं किया जा रहा है, लेकिन अब धीरे-धीरे होने लगा है। भविष्य में आशा की जा सकती है कि यह उद्योग बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा जिसके निम्नलिखित कारण है -

1. भारत में अलग-अलग प्रकार के फल कम कीमतों में आसानी से प्राप्त हो जाते हैं।

2. परिरक्षित फलों एवं सब्जियों के भिन्न-भिन्न पदार्थों की होटलों, अस्पतालों व अमीर लोगों को अधिक मात्रा में आवश्यकता है। इसलिए फलों को उनके मौसम में परिरक्षित करके अत्यधिक लाभ आसानी उठाया जा सकता है।

3. ताजे फलों और सब्जियों से निर्मित किए गए पदार्थों की विदेशों में अत्याधिक मांग रहती है। इसलिए इन पदार्थों को विदेशों में भेजने से विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है। इसी कारण इस उद्योग का भविष् अत्यधिक उज्जवल है।

4. फल एवं सब्जियों का परिरक्षण का कार्य लघु उद्योग के रूप में आसानी से अपनाया जा सकता है। इसके लिए राज्य सरकारें  प्रशिक्षण, धन तकनीकी सहायता से विशेष सुविधायें उपलब्ध करा रही है।

5. केंद्रीय सरकार व राज्य सरकार फल एवं सब्जियों के परिरक्षण के लिए प्रशिक्षण सुविधाएं प्रदान करा रही हैं जिसके अतिरिक्त सामुदायिक डिब्बा बन्दी केंद्रों, फल परिरक्षण संस्थानों तथा अन्य सुविधायें उपलब्ध करा रही हैं, ताकि बेरोजगार लोगों को रोजगार प्राप्त हो सके।

6. उत्तरी पहाड़ियों की समशीतोष्ण जलवायु में अधिक फल उत्पन्न होते हैं तथा उन्हें बाजार में भेजने पर उनकी कीमत बहुत कम हो जाती है। आवागमन के साधन उपलब्ध न होने के कारण उनकी काफी मात्रा वहीं पर खराब हो जाती है।

और यदि आवागमन की सुविधाएं वहां पर उपलब्ध भी है तो अत्यंत महंगी है। इसी कारण यदि फलों का वहीं पर परिरक्षण कर दिया जाए तो फल उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं दोनों को ही लाभ मिल सकेगा इसके साथ ही उपभोक्ताओं को पूरे वर्ष भर फल आसानी से प्राप्त होते रहेंगे।

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