नींबू घास या लेमन ग्रास क्या हैं और इसकी खेती कैसे करते है पूरी जानकारी

नींबू घास या लेमन ग्रास की खेती कैसे करते है 

नींबू घास या लेमन ग्रास क्या हैं और इसकी खेती कैसे करते है पूरी जानकारी
नींबू घास या लेमन ग्रास क्या हैं और इसकी खेती कैसे करते है पूरी जानकारी


नींबू घास का परिचय

लेमन घास के पत्तों से तेल निकाला जाता है। इस तेल का उपयोग विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण, उच्चतम क्वालिटी के इत्र बनाने में तथा सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है।

यह घास बहुवर्षीय होती है तथा इसमें सूखा सहन करने की क्षमता होती है। प्रारंभिक अवस्था में इसके तने की वृद्धि नहीं होती है। इसकी पत्तियां 120-130 सेंटीमीटर लंबी तथा 1.5-2 सेंटीमीटर चौड़ी होती हैं।

इसका तना पुष्पन के समय बढ़ता है तथा लंबाई 2.5-3.5 मीटर तक हो जाती है। इसमें कल्ले 20-80 प्रति पौधे होते हैं। आधार के पास की पर्ण संधि लाल-बैगनी रंग की होती है।

पुष्पक्रम पेनिकल होता है जो शीर्ष में लगभग 8 से 10 पर्व संधि पर प्रत्येक पर्ण के कक्ष से निकलती है।तने के शीर्ष भाग में पुष्पक्रम लगभग 75-120 सेंटीमीटर लंबाई का होता है।


नींबू घास के लिए उचित जलवायु

नीबू घास उष्ण एवं उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में सुचारू रूप से वृद्धि करती है। समान रूप से वितरित 250-300 सेमी बर्षा इसके लिए उपयुक्त होती है।

इसके अलावा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी वृद्धि होती है। यह प्रमुख रूप से बर्षा आधारित असिंचित दशा में उगाई जाती है। केरल में यह लगभग 30,000 हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है।

नींबू घास के लिए आवश्यक भूमि

सभी प्रकार की भूमियों में इसकी खेती की जाती है। परंतु जल लग्नता यह सहन नहीं कर सकती है। अतः अच्छे जल निकास वाली भूमि का चयन करना आवश्यक होता है। इसकी खेती के लिए दोमट मिट्टी बहुत अच्छी होती है।

ढलान वाले क्षेत्रों में जहां पर मृदा क्षरण अधिक होता है वहां पर इसकी रोपाई करने से मृदा क्षरण को रोका जा सकता है। यह 1.5 PH तक की मृदा में उगाई जा सकती है।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है।यह पहाड़ों के ढलानों के बंजर क्षेत्र में भी उगायी जा सकती है।

नींबू घास की उन्नत जातियां ( किस्में )

प्रगति, प्रमान, कावेरी, कृष्णा, चिरहरित, जी. आर. एल. - 1 , ओ.डी - 19, ओ.डी - 40, आर.आर.एल -16, सी.के.पी. - 25

बीज की मात्रा व बोने की विधि

सिमेप की अनुशंसा के आधार पर 4-5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर एवं आई.सी.ए.आर. की अनुशंसा के आधार पर 10 किलोग्राम  प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है।

कल्लों से रोपाई करने के लिए लगभग 50,000 से 1,00,000 कल्लों की आवश्यकता होती है। बीजों को अप्रैल-मई में नर्सरी तैयार करके बोते हैं।

1 सप्ताह में बीज उग आते हैं। 60 दिन बाद पौधों को नर्सरी से उखाड़ कर तैयार खेतों में रोपाई कर देते हैं। इसकी रोपाई पुरानी फसल के कल्लों से भी कर सकते हैं।

नींबू घास की खेती के लिए रोपाई का समय

असिंचित दशा में जुलाई के प्रथम सप्ताह में एवं सिंचित दशा में रोपाई फरवरी - मार्च में की जाती है।

रोपाई की विधि

इसकी रोपाई करते समय 40 सेंटीमीटर पौधों के बीच की दूरी व 50 सेंटीमीटर कतारों के बीच की दूरी रखना आवश्यक होता है। जडदार कल्लों को 5-8 सेंटीमीटर की गहराई तक रोपें तथा अच्छी तरह दबा दें।

अधिक गहराई पर लगाने से जडें सड जाती हैं। रोपाई करने के तुरंत बाद यदि वर्षा न हो तो सिंचाई कर देनी चाहिए।

नींबू घास की खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक

इसकी फसल खाद एवं उर्वरक के बिना भी ली जा सकती है। परंतु अधिकतम उत्पादन के लिए खेत की तैयारी के समय गोबर की सड़ी खाद 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देकर अच्छी तरह मिला देनी चाहिए।

इसके अलावा नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश भी 75:30:30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देना चाहिए।रोपण के पहले खेत तैयार करते समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा देना चाहिए।

शेष नत्रजन की आधी मात्रा पहली कटाई के बाद दे देनी चाहिए। जैविक विधि में रासायनिक उर्वरक के बदले केंचुए की खाद देनी चाहिए।

नींबू घास की खेती में निंदाई

प्रारंभिक अवस्था में यदि खरपतवार हो तो निंदाई करना आवश्यक होता है। उसके बाद घास अधिक बढ़ जाती है व नींदा को दबा देती है।

नींदानाशक दवाओं जैसे ऑक्सीफलारफेन 0.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या डाइयूरान 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर खेत में छिड़काव करके नींदा नियंत्रित किए जा सकते हैं।

नींबू घास की खेती में सिंचाई की आवश्यकता

इस फसल को सिंचाई की अधिक आवश्यकता नहीं होती है लेकिन अधिक उत्पादन लेने हेतु सिंचाई करना आवश्यक होता है। प्रत्येक फसल कटाई के बाद सिंचाई करना चाहिए।

सिंचाई करने से कटाई की संख्या व तेल की मात्रा में वृद्धि होती है।गर्मियों में 10 दिनों के अंतराल पर एवं सर्दियों में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

नींबू घास की खेती की कटाई

पहली कटाई 3 माह के बाद की जाती है। उसके बाद 3-4 माह में कटाई की जाती है।मृदा की उपजाऊ शक्ति, सिंचाई तथा उर्वरक की मात्रा के आधार पर कटाई की संख्या निर्भर करती है।

प्रतिवर्ष लगभग 4 कटाई की जा सकती हैं।इस प्रकार एक बार लगाने के बाद लगातार 5 सालों तक 3-4 कटाई प्रतिवर्ष की जा सकती हैं। हरी घास का उपयोग तेल निकालने में होता है।

उपज

10-25 टन प्रति हेक्टेयर हरी घास पैदा होती है। जिससे 40-80 किलोग्राम तेल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। घास के ताजा वजन के आधार पर 0.35% तेल उपलब्ध होता है।

फसल चक्र

नीबू घास 5 वर्षीय फसल है। एक बार लगाने के बाद 5 वर्ष तक समय-समय पर कटाई की जा सकती है। एक वर्ष में 3-4 बार कटाई की जाती है। लेकिन अनुपजाऊ भूमि में 3 वर्ष बाद फसल खराब हो जाती है इसलिए अनुपजाऊ भूमि में 3 वर्ष बाद फसल को बदल देना चाहिए।

पत्तियों का आसवन

हरी घास का उपयोग तेल निकालने में किया जाता है। पत्ती, तना व पुष्पक्रम में तेल पाया जाता है अतः ऊपरी भाग आसवन के लिए उपयोगी है। कटाई के बाद फसल को 3-4 घंटे तक सुखा लेना चाहिए।

इससे घास का वजन कम हो जाएगा। सूखी घास को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर आसवन करें। आसवन 3-4 घंटे में हो जाएगा। आसवन होने के बाद पानी और तेल को अलग - अलग कर लिया जाता है।

नींबू घास की खेती में लगने वाले कीट

(1) चूहों का प्रकोप

जिंक फास्फाईड या बेरियम क्लोराइड का प्रयोग करें।

(2) दीमक

नीम या करंज की खल्ली का प्रयोग करना चाहिए।

(3) सफेद मक्खी

मोनोक्रोटोफॉस 0.05% का छिड़काव करना चाहिए।

(4) शुट फ्लाई

फोरेट 10 जी की 10-12 किलो प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाएं।

नीबू घास (लेमन घास - Lemon Grass) के उपयोग

नीबू घास का महत्व उसके सुगंधित तेल के कारण है। जिसका उपयोग कॉस्मेटिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, कीटनाशक एवं दवाओं के निर्माण में किया जाता है। इस तेल का मुख्य घटक सिट्राल होता है।

सिट्राल से अल्फा आयोनोन एवं बीटा आयोनोन तैयार किए जाते हैं। बीटा आयोनोन से विटामिन 'ए' संश्लेषित किए जाते हैं।अल्फा आयोनोन से गंध द्रव्य बनाने के लिए अनेक सुगंध रसायन संश्लेषित किए जाते हैं।

लेमन घास से होने वाले लाभ

(1) पहली फसल मात्र 120 से 150 दिनों में ही प्राप्त हो जाती है।

(2) फसल को एक बार लगा देने के बाद 5 वर्ष तक लगातार उत्पादन प्राप्त होता रहता है।

(3) खरपतवारों का प्रकोप अन्य फसलों की अपेक्षा कम होता है।

(4) इस फसल को पशुओं से हानि की संभावना नहीं है।

(5) बाजार में मांग अधिक है, इसलिए अच्छे मूल्य प्राप्त हो जाते हैं। जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है।

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